भील घर

House of Bhil

भील सूखे और कम उपजाऊ वाले भू-भाग में रहते हैं । फसलें कम होती हैं, इसीलिये उसकी देख भाल की गरज से भील खेतों में ही घर बनाकर रहते हैं। इन्हीं कारणों से गाँव की बसाहट छितरी-छितरी होती है | पूर्वांभिमुख भील घर आगे-पीछे की ओर दो ढाल के छप्पर वाला होता है।

ठप्पर और घर का मुख्य भार थामने वाली बल्लियाँ सागौन की होती हैं। घर की दीवारें और अनाज की कोठियाँ पहले ढलानों पर उगने वाली सियावा जड़ी को गूँधकर तैयार ठट्टर से बनाये जाते थे। इस काम में अब बाँस का प्रयोग होता है, क्योंकि ये झाड़ियाँ अब आसानी से मिलती नहीं हैं। इसके भीतर-बाहर से थोड़ी मिट्टी लगाकर दीवार को मजबूती दी जाती है । ठप्पर सागौन या खजूर के पत्तों या कवेलुओं से बनता है।

घर के खास हिस्से होते हैं-' ओहरी वाला घर जहाँ खाना बनता है, अनाज रखा जाता है और घर की देवी रहती है । सागौन के पाँच हाथ ऊँचे 'घिन्चरी 'नामक खम्भ पर इस धरती की देवी का निवास होता है तथा इस पर लाल कपड़ा बाँधा जाता है, जिसे परिवार के किसी भी खास प्रसंग में पूजा जाता है ।

घर का दूसरा हिस्सा जो सोने, सामान रखने के काम आता है, उसे ' मेवाड़ा कहते ' हैं ।

घर के बाहर आँगन होता है जिसमें पानी से भरे मटके रखने के लिये पलेंडी होती है। घर की बाहरी दीवारों की दायीं-बायीं ओर ठप्पपर निकालकर ढालिया बनाते हैं, जिनमें मवेशी, चारा, कण्डे, लकड़ी आदि रखे जाते हैं।

जिन इलाकों में स़ागौन का अच्छा जंगल है, वहाँ घरों में लकड़ी पर खासी नक्काशी देखने को मिलती है। घर की दीवारों पर स्त्रियाँ खुले हाथ के छापे, मुट्ठी के छापे या सरकला तथा अन्य मांगलिक चित्र बनाती हैं ।

House of Bhil

House of Bhil

The Bhils mostly live in dry and less fertile areas, so the crops are less, that's why Bhils build their houses in the fields to take care of them. Due to these reasons, the arrangement of the village is scattered. The east-facing Bhil house has a two-slope roof at the front and back.

The battens which bear the whole weight of the roof are made of teak. The walls of the houses and granaries were earlier made of thatch prepared by knotting the "siyava’' bush growing on the slopes. Bamboo is now used for this work, because these bushes are not easily available now. The wall is strengthened by applying some clay from inside and outside. The roof is made of teak or date palm leaves or kawelu.

There are some special parts of the house — 'Ohri Wala ghar' where food is cooked, grains are kept and the deity of the house resides. The goddess of this earth resides on a five hands high teak pillar called ‘Ghinchari’ and a red cloth is tied on it, which is worshiped on every occasion. The second part of the house which is used for sleeping and keeping other things is called Mewara.

The courtyard outside the house in which there is a Palendi to keep pots filled with water. On the right and left side of the outer walls of the house, 'Dhalia’ is made by taking out thatch, in which cattles, fodder, sticks, woods etc. are kept. In the areas where there is a dense teak forest, a lot of wood carving in the houses can be seen there.

Women paints open hand prints, fist prints or Sarkala and other auspicious symbols on the walls of the house.